16 मई 2019 - 19:29
ट्रम्प के लिए एक पाठ, इरादों की जंग में ईरान से कैसे हारे जार्ज बुश?

जब से अमरीका में ट्रम्प सरकार आई है उसने अमरीका में ईरानी नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया, परमाणु समझौते से बाहर निकलने का एलान किया, ईरान पर कई चरणों के प्रतिबंध लगाए, बिल्कुल ही असाधारण क़दम उठाते हुए ईरान की पासदाराने इंक़ेलाब फ़ोर्स को आतंकी संगठन घोषित कर दिया, उसने घोषणा की है कि ईरान के तेल निर्यात को ज़ीरो बैरल तक पहुंचा दे।

यदि ईरान में इस्लामी क्रान्ति आने के बाद अमरीका और ईरान के संबंधों का जायज़ा लिया जाए तो यह तथ्य सामने आएगा कि ईरान से दुशमनी बरतने में ट्रम्प पिछले राष्ट्रपतियों से अलग नहीं हैं। बल्कि ट्रम्प सरकार की कुछ विशेषताएं एसी हैं जिनकी वजह से वह ईरान पर दबाव डालने में पिछली सरकारों से कमज़ोर है।

बाराक ओबामा के बारे में आम धारणा है कि उन्होंने ईरान के बारे में अलग रवैया अपनाया लेकिन यदि गहराई से जायज़ा लिया जाए तो वह भी ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश में थे मगर इसके लिए उन्होंने कार्यशैली अलग प्रकार की अपनाई। आज ट्रम्प ईरान पर जो प्रतिबंध लगा रहे हैं उनमें वास्तव में बहुत से प्रतिबंध वही हैं जो ओबामा के शासन काल में लगाए थे। सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 1929 वर्ष 2010 में पारित हुआ। इस प्रस्ताव के तहत ईरान पर मुख्य प्रतिबंध लगाए गए यह ओबामा के शासन काल में हुआ। इस प्रस्ताव के तहत ईरान के ऊर्जा सेक्टर को निशाना बनाया गया, वित्तीय संसाधनों तक ईरान की पहुंच में रुकावट डाली गई, ईरान आने जाने वाले समुद्री जहाज़ों और विमानों की विशेष चेकिंग तथा प्रतिबंधों के उल्लंघन की निगरानी के लिए सिस्टम की स्थापना जैसे क़दम उठाए गए।

ट्रम्प के बारे में यह कहना चाहिए कि उन्हें इस बात का आभास नहीं है कि प्रतिबंधों की एक समय सीमा होती है यदि इसके बाद भी प्रतिबंधों को जारी रखा जाए तो वह अपने आप नाकाम हो जाते हैं। ओबामा ने ईरान से वार्ता के बारे में कहा कि उन्होंने महसूस कर लिया था कि यदि ईरान पर प्रतिबंध जारी रहे तो इनकी उपयोगिता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। इसी लिए ओबामा ने प्रतिबंध  लगाते समय भी यह कोशिश की कि ईरान से वार्ता शुरू हो जाए।

एक बिंदु यह ही है कि ट्रम्प ने ईरान पर प्रतिबंध एसे समय में लगाए हैं कि जब इन प्रतिबंधों पर वह अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं बना पाए हैं बल्कि उन्हें भारी विरोध का सामना है।

दूसरी बात यह है कि ओबामा को अच्छी तरह पता था कि ईरानी राष्ट्र प्रतिरोध करने वाला राष्ट्र है दबाव के आगे झुकेगा नहीं, ट्रम्प को यह महसूस हो रहा है कि दबाव डालकर वह ईरान को झुका ले जाएंगे।

यदि जार्ज बुश जूनियर की बात की जाए तो वह मनोवैज्ञानिक युद्ध के साथ ही सैनिक चढ़ाई करके ईरान में अशांति फैलाना चाहते थे। बुश की सरकार में उप राष्ट्रपति डिक चेनी तथा युद्ध मंत्री डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड यह विचार रखते थे कि ईरान पर हमला  करना चाहिए मगर तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री कान्डोलीज़ राइस का कहना था कि मनोवैज्ञानिक युद्ध और प्रोपैगंडा का सहारा लेकर ईरान में अशांति फैलाई जानी चाहिए ईरान से टकराना उचित नहीं है।

जार्ज बुश ने मनोवैज्ञानिक युद्ध और प्रौपैगंडे का प्रयोग करते हुए लोकतंत्र के विस्तार की बात की। इस प्रोपैगंड का उद्देश्य ईरान में आंतरिक रूप से अशांति फैलाकर इस्लामी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को समाप्त करके अमरीका की इच्छा के अनुरूप सरकार को सत्ता में लाना था। अमरीका ने इस उद्देश्य से वर्ष 2005 से 2009 तक हर साल 40 करोड़ डालर ख़र्च किए। जार्ज बुश ने अपनी सरकार के अंतिम वर्षों में ईरान में धार्मिक और जातीय टकराव उत्पन्न करने के लिए बहुत एड़ी चोटी का ज़ोर लगाया। जार्ज बुश ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ख़त्म करने की कोशिश की। यह सब कुछ करने के बाद जार्ज बुश को पता चला कि ईरान के मामले में ज़मीनी सच्चाई कुछ और है। यह बात पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री जान कैरी ने अपनी किताब में लिखी है। जान कैरी ने लिखा कि लंबे समय तक अमरीका का स्टैंड यह था कि यदि ईरान में यूरेनियम संवर्धन बहुत सीमित स्तर पर भी जारी रहा तो ईरान से कोई समझौता नहीं हो सकता लेकिन बाद में सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों और जर्मनी ने यह स्वीकार किया कि ईरान में यूरेनियम संवर्धन एक एसी सच्चाई है जिसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। ईरान को भी वह अधिकार मिलना चाहिए जो दूसरे बहुत से देशों पास मौजूद है। मैंने यह भी पाया कि जार्ज बुश सरकार भी यह स्वीकार करती थी कि ईरान में यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता।

जान कैरी की तरह विलियम बर्न्ज़ ने भी अपनी पुस्तक में लिखा कि जार्ज बुश की सरकार आख़िरकार यह समझ चुकी थी कि ईरान को इरादों की जंग में हराया नहीं जा सकता इसलिए उसने अपनी नीतियों में बुनियादी बदलाव किया। जहां तक ट्रम्प की बात है तो उन्हें ज़्यादा समय नहीं लगा है वह बहुत जल्द समझ गए हैं कि ईरान के मामले में उनकी नीतियों का अंजाम नाकामी के अलावा कुछ नहीं होगा।

ट्रम्प चीन के साथ व्यापार युद्ध में भी कमज़ोर पड़ रहे हैं, उत्तरी कोरिया को नियंत्रित करने की उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं, वेनेज़ोएला में मादोरो सरकार का तख़्ता उलटने की उनकी योजना धरी की धरी रह गई है। रूस ने भी अमरीका से अपनी ताक़त का लोहा मनवा लिया है।

जहां तक ईरान की बात तो इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने कहा कि ईरान और अमरीका के बीच इरादों की जंग हो रही है और इस जंग में विजय ईरान की ही होगी। वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम जंग की कोशिश में नहीं हैं और अमरीका को भी जंग से कोई लाभ होने वाला नहीं है और यह बात अमरीका अच्छी तरह जानता है। इस समय जो कुछ हो रहा है यह इरादे की जंग है और हमारा इरादा अमरीकियों से ज़्यादा मज़बूत है।